बुधवार, 16 अप्रैल 2014

बूम चीक बूम चीक

  बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे
गाड़ी दौड़ी जाए रे
     बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे 


गाँवों  को ज़ोडे शहरों से
शहरों को नगरों से जोड़े रे
भेद-भाव नही इसके मन मे 
सबको साथ ले जाए रे 
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे 


हर स्टेशन प रुकती जाए
मंज़िल तक पहुँचाए रे 
हरा रंग का सिग्नल देखे 
सरपट भागी जाए रे 
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे


घाटी पर्वत नदियाँ झरने 
सबको ये दिखलाए रे
सिटी बजाए शोर मचाए
गाड़ी भागी जाए रे 
    बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे


              काला -गोरा मोटा -पतला             
सबको ये बैठाए रे
बच्चों के मन को भाए
नानी घर ले जाए रे
बूम चीक बूम चीक बूम चीक रे।                                                          








































प्यार भरो बच्चों के दिल में

प्यार भरो बच्चों के दिल में
सावन बन बरसेगें वो 

पढ़ा लिखा विद्वान बनाओ
रोशन नाम करेंगे वो

मीठी वाणी इनसे बोलो
हँस-हँस बात करेंगे वो

दिल में इनके दीप जलाओं
रोशन राह करेंगे वो 

गीत भरो तन-मन में इनके
चहक-चहक गाएंगे वो

सच्चे सुख की राह दिखाओ
धरती स्वर्ग बनाएंगे वो

प्यार से इनको गले लगाओ 
नेह सुधा बरसाएंगे वो

नन्द यशोदा बन कर पालो
बन कर कृष्ण दिखाएंगे वो।












































































































































































































































































































































एक से दस तक

एक देगची
चावल दो
नहीं पके
तीन दिन वो

चार कबूतरों
को बुलवाया
पाँच दिनों तक
पानी भरवाया

छः चिडियाँ 
बिनने  को बैठी 
सात बत्तकों से
पंखा  झलवाया

आठ चूल्हों
पर उसे चढ़ाया 
नौ मन लकड़ी
हाथी लाया

देख रहे थे
दस -दस बच्चे
फिर भी चावल
रह गए कच्चे

कृष्णा ने सबको
को समझाया 
खेल-खेल  में
पाठ पढ़ाया।  













































कृष्णा और बरसात








मैंने कृष्णा को
भीगा हुवा देख कर पूछा -
बरसात में छत पर
क्यों गए थे ?

कृष्णा बाल शुलभ
नज़ाकत से बोला -
दादाजी परोपकार का
काम करने गया था

मैंने आस्चर्य से पूछा -
भला बरसात में छत पर
तुम कौन सा परोपकार का काम
करने गए थे ?

जब बरसात में कोई भी
नहीं भीगता तो स्वयं बरसात को
भीगना पड़ता है यही तो कल आपने
कहानी में बताया था

कृष्णा आँखे मटकाकर बोला-
अगर मैं छत पर जा कर
नहीं भीगता तो स्वयं बरसात
को भीगना पड़ता


इसलिए  मैं छत पर चला गया
अब काम से काम बरसात को
भीगना तो नहीं पडेगा
दादाजी।


















समै रो जथारथ

घर सूं कागद आवंतो जणां 
सात समाचार लिख्योडा आवंता
बदलाव समै रो
लोग कागद लिखणो ही भूलग्या
,ई'मेल स्यूं आधा आखर लिख"र ही
काम काढबा लागग्या

तीज त्योंहार आयां घर-आंगणा मांय 
हिरमिच-गेरू का मांडणा मांडता
चालगी आन्थूणी  पून 
अब प्लास्टिक का स्टीकर लगा' र  ही
 काम काढबा लागग्या

ब्याव-सावै पीळा चावल देंवता
मान-मनवार स्यूं बूलावंता 
अब तो प्रीत-प्रेमरी बात ही कोनी
 सीधा मोबाइल पर मेसेज भेज'र  ही
काम काढबा लागग्या

मरणै-खरणे री खबर सुण्या
सगळ गाँव का लोग भेळा हुंवता
समै रो जथारथ
अब तो लोग मूंडो दिखा'र  ही
 काम काढबा लागग्या

मिलता जणा जै रामजीकी कैवंता
 दुःख-सुख की दो बात पूछता 
अब तो नुवीं हवा रा लहरका सरणाट बेवै
लोग-बाग़ हाय-हल्लो कर ही
काम काढ़बा लागग्या

उन्याला में गाँवतरा स्यूं कोई आँवतो जणा
 भर बाटको छाछ -राबडी घाळ ता
 पी'र  कालजो तिरपत हुज्यातो
अब तो एक कप चाय पकड़ा'र  ही
  काम काढ़बा लागग्या

होली दियाली एक दूजा के घरां  जांवता
जणा बडोड़ा ने पांवाधोक देंवता
टाबरियाँ न लाड़ करता
अबै नै की आणी नै की जाणी
सगला लैपटॉप में ही सिमटण लागग्या।









































मतलब स्यूं स्यांणा


जका को कदैइ
कीं  नी देखोड़ो हुवै
और जे थोड़ो-घणो
बापर ज्यावै

बो खुद ने
फैर अणुतो ही
हुंस्यार समझण
लाग ज्यावै

जै कदास कोई बात
पूछ बैठे जणासं सोचै
म्हारे में काइंठा
कतीक ऊरमा  है

आनी सोचै
गरज पड्यां लोग
गधा ने भी
बाप बणाव है

सागळा
आप-आपरे
मतलब सूं
साँणा हुवै है।























फागण आयो


फागण आयोरे साथीड़ा थारी
याद सतावै  रे
फागण आयो रे

गळी -गळी  में फाग टोलियां
हिलमिल होळी गावै  रे
अवधपुरी में दशरथ नंदन
रंग बरसावै  रे
फागण आयो रे

हो हो फागण आयो रे साथीड़ा
थारी याद सतावै  रे
फागण आयो रे

गळीया मांय गुलाल उड़त है
सज गयी मथुरा नगरी रे
काना के  संग फाग खेलबा
राधा आई रे
फागण आयो रे

हो हो फागण आयोरे साथीड़ा
थारी याद सतावै  रे
फागण आयो रे

झर-झर बरसे रंग केसरी
बरसाणे-नंदगांव रे
छप्पन भोग छके मनमोहन
खूब लूंटावै  रे
फागण आयो रे

हो हो फागण आयोरे साथीड़ा
थारी याद सतावै  रे
फागण आयो रे

बरसाणै  की गुजरयााँ  ओ
नंदगांव रा ग्वाल रे
नाचै गावै झूमै सारा
रंग बरसावै रे
फागण आयो रे

हो हो फागण आ,योरे साथीड़ा
थारी याद सतावै  रे
फागण आयो रे

ग्वाल-बाल संग कृष्ण कन्हैया
मिल कर रास रचावै  रे
ढोल-मृदंग मजीरा बाजै
करै ठिठोली रे
फागण आयो रे

हो हो फागण आयोरे साथीड़ा
थारी याद सतावै रे
फागण आयो रे।




























कुदरत रो खेल


एक सी तो माटी
एक सी बैव पून
एक सो तप सूरज
मूल में बेव एक सो पाणी

फेर ऐ न्यारा
न्यारा स्वाद
कठै स्यूं निपज्या
कियां हुयो ओ अचरज ?

दाड़मा"र मौसमी
आम"र अंगूर
काकड़ी"र मतीरा
न्यारा-न्यारा रूप'र सुवाद

मिनख रै  समझ
में नहीं आवै ओ खेल
सारो कुदरत रो खेल
कठै कांई निपजा देव

समझ केवल सिरजनहार
सिरजनहार री खिमता
कुण समझ सक्यो
अर कुण समझ पावैळो।





















































































































































































गर्मी रो दिन

जेठ -असाढ़ के महीना में 
घड़ी -दो घड़ी दिन कोनी चढ़ै 
जताने तो तपबानै 
लाग जावै सूरज

दस बज्यां ही घर स्यूं बारै
निकळबो  होज्या मुसकिल
आभा सूं बरसावण लागै
खीरा सूरज

दोफारी  मे चालै लूवां
गली में बैठ्या कुता हुळक ज्यावै
अर सड़कां पर पड्यो डामर
पिघल ज्यावै

बलतो बायरो चैपे
ताता चींपिया डील माथै
गाभा करण लाग ज्यावै चप-चप
पसेवो बैवे जाणै न्हार निकल्यो हुवै

दिन आंथै  कौनी
बिउं पैली आ ज्यावै
बाळणजोगी आँधी अर
करदै टापरा को सत्यानाश

रात बापड़ी ठंडी हुवै
जणा जा' र  थोड़ी शांती मिलै
पण दिन उगता ही सूरज फैरू
तपबाने लागज्यावै लगादै गळपांश।














गाँव रो पींपळ


गँवाई कुवै के
जिवणे पासै हो पीपंळ
अर पिपंळ  रे पसवाड़े हो सती रो देवरो 
लुगायां दादी रो दैवरो धौकती 

गौर-ईशर री जद सवारी
कूवै पर आंवती जणा गाँव री
छोरया-छापरयां पींपळ रै हैठे
भैळी  हुय र गीत गांवती

नुवों ब्याव हुयोड़ो जोड़ो
सती दादी रै गठजोड़े री
जात देवण आंवतो जणा
पींपळ री छियां आशीष देवंती

बैसाख रे महीना में
भोरान-भोर गाँव री लुगायाँ
पीपळ सींचण ने आंवती
गट्ट पर बैठ'र  कांण्या कैंवती

टाबरिया रमता पींपळ री 
छियाँ मांय दड़ी र गेडियो
लगाता लंम्बा-लंबा टौरा 
जेठ-असाड री गरमी रे मायं

पींपऴ के नीचे हुवंती
नारा-गाड्या री दौड़ अर
देखतो पुरो गाँव गौर के
मंगरीया मांय

पण आज गँवाई कुवै के 
पास कौनी रियों पिंपळ 
पण जका देख्या ही कौनी पिंपळ 
बानै कियां याद आवेगी ऐ बातां 

आसीस रे ओळावै 
पीपळ देग्यो आपरी 
समूची उमर गाँव नै अर 
छोड़ग्यो ळारै मीठी बातां।