गुरुवार, 26 जून 2014

प्यार की पराकाष्ठा

दोनों एक दूजे  के
सुख-दुःख में शामिल

कई अनमोल सौगाते  
एक दूजे की 
एक दूजे के पास

गात अलग 
लेकिन मन एक 

मेरे मन कि बात 
अनायास निकल पड़ती है  
तुम्हारे मुख से

और तुम्हारे मन कि बात 
निकल आती है
मेरे होठों से

सब कुछ समाहित है
एक दूजे का 
एक दूजे में 

कहीं यही तो नहीं है
प्यार की पराकाष्ठा 
मेरा प्यार - तुम्हारा प्यार।































हिमपात


युवा साइड वाक् पर
शीत ऋतु की स्वास्थ्यप्रद वायु का
सेवन करते हुए दौड़ रहे हैं 

बच्चे बर्फ के गोले बना
एक दुसरे पर फैंक रहे हैं 
फिसल रहे हैं, स्नोमैन बना रहे हैं 

चाँदनी रात में बर्फ
चाँदी की तरह चमक रही है
सड़क दूध का दरिया बन गया है 

पेड़ो और पत्तों पर
लगता है कोई चित्रकार 
सफ़ेद रंग करते-करते सो गया है

ठण्ड से ठिठुरता
सूरज कहीं डर कर छुप गया है
अब तो यदा-कदा ही मुहँ दिखा रहा है

-23 डिग्री सेल्सियस तापमान
और हिम शीतल बयार से बेखबर
जन-जीवन  सामान्य गति से चल रहा है। 

मेरी चाहत

मेरी चाहत है
तोड़ लाऊं मेहंदी के पत्ते
लगाऊं चटक रंग तुम्हारी
हथेलियों पर और 
सजाऊं तुम्हे। 

मेरी चाहत है 
समंदर से चुन लाऊं 
मोतियों वाली सीपियाँ 
और बना कर सुन्दर हार
पहनाऊं तुम्हे।  

मेरी चाहत है 
बगीचे में जाकर 
चुन लाऊं बेला के फूल 
और बना कर गजरा 
सजाऊं तुम्हे।  

मेरी चाहत है 
इंद्रधनुष के रंगो में
रंगाऊं रेशम की चुन्दडी
और लगा कर चाँद-सितारे
औढ़ाऊं तुम्हे।
                                 










































































लिखेंगें किसी दिन।




महानगर की झलक

देश का महानगर
वृहत्तर कोलकाता
जिसकी मुख्य सड़क
सेंट्र्ल ऐवन्यू का
एक नजारा

विवेकानन्द रोड क्रॉसिंग
छोटी-छोटी बच्चियों की
गोद में नंग धडंग बच्चे
भीख मांगते,फटेहाल
भूख से बिलबिलाते
दयनिय भाव से याचना करते

महात्मा गांघी रोड क्रॉसिंग
ताली पीटते,कमर मटकाते
वो लोग जिन्हे सरकार न तो
औरत समझती और न मर्द
आपकी सलामती की दुवाओं
के साथ हाथ फैलाकर याचना करते

बहु बाज़ार क्रॉसिंग
उम्र की ढलती साँझ में
टूटी हुई ,सताई हुई वो औरतें
जिन्हे चबा कर पीक की तरह
सड़क पर थूक दिया गया है
कात्तर स्वर में सहायता की याचना करते

चाँदनी चौक क्रॉसिंग
लकड़ी के पटरो पर घिसटते
लूले,लंगड़े,अंधे,अपाहिज
छालों और घावों का दर्द सहते
भूख से बिलखते सहायता के लिए
अल्लाह के नाम पर याचना करते

यह है मेरे प्रगतिशील भारत के
महानगर की एक तस्वीर
जिसे आप और हम
रोज सुबह-शाम
आते जाते देख देखतें हैं
और बस देखतें ही रहतें हैं।




























































उधेड़ देना चाहती हूँ।

भलाई का काम

आओ बंधु !
घर से बाहर निकलो
कब तक कमरे में बैठे टी वी
देखते रहोगे ?

ईश्वर ने हमें
मानव तन दिया है
क्या इस से कोई भलाई का
काम नहीं करोगे ?

देखो कितना सुहाना मौसम है
ठंडी-ठंडी बयार चल रही है
आओ निकलो बाहर
आज कोई अच्छा काम कर आये

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाये
किसी भूखे को दो रोटी खिलाये
और नहीं तो किसी बीमार को
थोड़ी दवा ही पीला आये

देखो ! दुःखो का अंत तो
एक दिन सभी का होना है
हर अँधेरी रात के बाद
सूर्य निकलता है

हमें तो इश्वर ने एक मौका दिया है
क्यों नहीं हम उसका लाभ उठाये
हमें तो करना भी उतना ही है
जितना सामर्थ्य से होता है

आओ निकालो बाहर
चलो मेरे साथ
करते है आज मिल कर
एक भलाई का काम।  

पचास वर्षों का सफर


मेरी चाहत थी
इसी जीवन में
सब कुछ पाने की

नहीं चाहत थी
अगले जन्म में
फिर कुछ पाने की

तुम मुझे मिली
मानो गुलशन में
बहार आई

मेरी राहों के कांटे
पलकों से उठाये
तुमने

मुझे अम्बर तक
उठने का अहसास
दिया तुमनें

अपनी हँसी संग
मुझे मुस्कराहट
दी तुमने

जीवन के पचास
बसंत साथ बिताये
तुमने

चंद शब्दो मे कहूँ
जीवन में सब कुछ
दिया तुमने।  

बादल फट पड़े

१७ जून को देवभूमि में तांडव मचा
बादल क्या फटे मौत कहर ढा गयी।
                          कच्चे  मकानों  की क्या बात करे
                          चार चार मंजिले इमारते बह गयी।

अलकनंदा-मंदाकिनी  है पुरे उफान पर
कोई थमने का कही नाम नहीं ले रही है।
                   पुरे गाँव और शहर पानी में बह गए है
                   आसमानी कहर को धरती झेल रही है।

उतराखण्ड में ऐसा तांडव कभी नहीं हुवा
जल कुलांचे  भर रहा था हिरण की तरह ।
                  क़यामत का मंजर और तमतमाई लहर
                  मकान गिर रहे थे तास के पत्तो की तरह।

अभावग्रस्त पार्वत्य समाज बेहाल हो गया
नदी किनारे बसा जीवन बरबाद हो गया ।
                   दिल दहलाने वाला बना तबाही का मंजर
                    होटले, मकान,दुकान, सब कुछ बह गया।

मुक्ति के प्रतिक तीर्थो में  भ्रमण करते
लाखो तीर्थयात्री जगह -जगह फसं गए।
                     हजारो की संख्या में मरे,हजारो घायल हुए
                      गाडिया,बसे और बुलडोज़र सभी बह गए।

चारो और सुनाई दे रही थी खौपनाक चीखे
दिख रहा था मलबे में दबी लाशो का मंजर।
                      देव भूमि में ऐसा विनाशकारी बरपा कहर
                      लील गयी सब कुछ रस्ते में उफनती लहर।

हमें इस चेतावनी को समझना होगा
ग्लोबल वार्मिंग को कम करना होगा।
                      परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना होगा
                       नहीं तो  फिर इसी  तरह  से मरना होगा।

कटेली चम्पा


कोलकता के
विक्टोरिया मेमोरियल
का हरा भरा मैदान।

सुबह का समय
साइड वाक पर घुमते
लोगो का हुजूम।

कटेली चम्पा के
फूलो से वातावरण का
महकना।

फूलो का अपना
अस्तित्व कायम रखने की
  हर संभव कोशिश करना।

तभी क्रूर हाथो का
बढना पेड़ की तरफ और
 तोड़ लेना फूल को।

दो-चार हाथों मे से 
 निकलना फुल का और
नोच डालना पंखुड़ियों को।

कर डालना उसकी
गंध और कोमलता को
तहस-नहस।

इन्सान की हवस से
फुल के अस्तित्व का
चिर-हरण।

कटेली चम्पा के 
अन्तर से दुखोच्छवास
का छुटना। 

फूल जो पेड़ का सौंदर्य है, उसकी सोभा है, लेकिन विक्टोरीया में घूमते लोग कटेली चम्पा के पेड़ पर लगे फूल को ढूँढ कर तोड़ लेते है। थोड़ी देर फूल दो चार हाथो में घूमता है और फिर नोच कर डाल  दिया जाता है, पांच मिनट में फूल का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। 



































































बसंत हाइकु

बसंत आया
छा रहा कलियों में
प्यार का नशा।

चली बयार
झरने लगे पुष्प
दिन गुलाबी।

बसंत रंग
बजे मन मृदंग
सदा अनूठा।

गुलाबी फिजा
रिमझिम के गीत
गायें भंवरे।

रंग बसन्ती
छाया धरती पर
सृजन खिला।

खेतो में अब
गदराई सरसों
मन मगन।

आया बसंत
उड़ने लगा मन
पिया अनाड़ी।

कोयल कूके
बसंती उपवन
नाचै मयूर।

बौराये आम
मदमस्त महुआ
दहका टेसू।

दिन बसंती
तन मन गुलाबी
हंसी फागुनी।

पीली सरसों
रंग बिरंगे फूल
झूमा बसंत।





























































प्रकृति की चाहत

धूप चाहती थी
झुग्गी-झोंपड़ियों को रोशन करना 
घास-फूस के मकानो को गर्म करना 
सीलन और बदबू को हटाना
किन्तु वो कर नहीं सकी 
भीमकाय भवनों की छाया ने 
उसे अपने आगोश में समेट लिया। 

नदी चाहती थी 
उन्मुक्त हो कर बहना 
खेतो खलिहानो को लहलहाना 
किसान के चहरे पर मुस्कराहट लाना 
किन्तु वो कर नहीं सकी 
भीमकाय बाँधों ने 
उसे अपने आगोश में ले लिया। 

हवा चाहती थी
वायु मंडल को स्वच्छ रखना 
जन-मानस को शुद्ध प्राण-वायु देना 
फूलों की सौरभ को बिखेरना 
किन्तु वो कर नहीं सकी 
प्रदूषण के भीमकाय दैत्य ने 
उसे अपने आगोश में जकड़ लिया।