गुरुवार, 26 जून 2014

मानवता बच जायेगी


आकाश के
दिलकश नजारों को
प्रदुषण ने छीन लिया

रातों की
नींद को ट्रकों की
चिल्लपों ने छीन लिया

फलों का
स्वाद फर्टिलाईजर 
ने  छीन लिया

बच्चों  के
बचपन को होमवर्क
ने  छीन लिया

परिवार की
  एकता को महंगाई   
 ने  छीन लिया

दादी की
कहानियों को टी.वी.
 ने  छीन लिया

पक्षियों के
कलरव को टावरों
ने  छीन लिया

आपसी प्यार को
 अहम् की संकीर्णता
 ने  छीन लिया

दुनिया के अमन
चैन को आतंकवाद
 ने  छीन लिया

देर सवेर सही
 लेकिन एक दिन
यह बात समझ में आयेगी

जीतनी जल्दी
समझ में आएगी
मानवता बच जायेगी। 

रविवार, 22 जून 2014

महानगर

यह महानगर है
यहाँ कुत्ते नहीं भौंकते
बिल्लियाँ रास्ता नहीं काटती
यहाँ बेकाबू गाड़िया दौड़ती है

तुम ठिठक कर
खड़े क्यों हो गये ?
सड़क पर जो दम तोड़ रहा है
उसे अभी-अभी सिटी बस ने कुचला है

अस्पताल पहुँचाने का
यहाँ कोई कष्ट नहीं उठायेगा
सभी ठिठकेंगे, देखेंगे और
निश्चिंत होकर आगे बढ़ जायेंगे

जब तक पुलिस आयेगी
घायल सड़क पर दम तोड़ देगा
यहाँ रोज सकुशल घर पहुँचने के लिए
लोग मनौती मना कर घर से निकलते हैं

यहाँ का यह आम नजारा है
आदमी के जीवन की कीमत
यहाँ कीड़े-मकोड़े के बराबर है
यह महानगर है।






                                                   

















































 तुम  हरदम लुटाती  हो। 

अनकहा दर्द

प्यार के लिए सात समुद्र पार
कभी कभी महँगा पड़ जाता है
             
                   एक का सानिध्य पाने के लिए
                   देश-परिवार सभी छूट जाता है

जवानी तो जोश में बीत जाती है
लेकिन बुढ़ापा भारी पड़ जाता है
             
                   अपनों  की यादें सताने लगती है
                   एकाकीपन भारी लगने लगता है

घुट कर उमर बीत जाती है
एक जीवन अपनों के बिना
             
                    छोटी आकांक्षायें भी रह जाती है
                    मन में किसी के साथ बाँटे बिना

उम्र भर तड़पते ही रह जाते है
पाने के लिए अपनों का  प्यार
                         
                        विदेशी धरती पर नहीं मिलता
                          अपनी धरती का सच्चा प्यार

जब यादों की गांठे खुलती है
गली दोस्तों की यादें आती है
                 
                      दिल में सिर्फ यादें ही बची रहती है
                      जिन्दगी घिसे सिक्के सी लगती है।





(पिट्टसबर्ग,अमेरिका में एक वृद्ध दम्पती से मिल कर, मुझे जो कुछ अनुभव हुवा,उसी को मैंने शब्द दिए हैं )



























टर्मिनल

भाग-दौड़ भरी 
जिंदगी में परिवार 
बिखरते जा रहे है

सभी इतनी तेजी से 
दौड़ रहे हैं कि 
मुड़ कर देखने का भी 
समय नहीं है

जिंदगी को जीवो 
लेकिन इतनी रफ़्तार 
से भी नहीं कि सब कुछ  
पिछे छूट जाए

दूरिया जीतनी तेजी से 
तय की जायेगी  
फासले उतने ही 
बढ़ते जाऐंगे  

वेग की भी एक 
मर्यादा होनी चाहिए 
रुकने के लिए भी एक 
टर्मिनल होना चाहिये

साल भर में एक बार
परिवार की सभी गाड़ियाँ
एक साथ आकर
ठहरनी भी चाहिये। 




  

जूते की पहचान

रास्ते की ठोकरों को  झेलता रहा जूता 
पाँवों    को  ठोकर से बचाता रहा जूता  
सर्दी हो या गर्मी, बसंत हो  या बरसात     
हर  मौसम मे साथ निभाता रहा जूता                                                                                                   
                                                                                               
रेगिस्तान की बालू मे झुलस्ता रहा जूता
पहाड़ों के पत्थरों से देह रगङता रहा जूता  
सियाचीन की ठंडक मे मुस्तेद  रहा जूता                                                                                                         हर जगह पाँवों का रक बना  जूता        

रैस के मैदान मे  दौङता रहा जूता
खेल मैदान  मे  खेलता  रहा  जूता 
जंग के मैदान में लड़ता रहा जूता          
पाँवों को हिम्मत बँधाता रहा जूता 

जंगलो  की  खाक  छानता  रहा जूता   
रास्तों का  भूगोल  लिखता रहा जूता      
पैरों के पसीने को चखता रहा जूता 
घर के  दरवाजे  पर पड़ा रहा जूता   

र्हिमालय की चोटी को लाँघ आया जूता   
अंटार्टिका की बर्फ  को चूम  आया जूता    
चाँद  तक   का  सफर कर  आया   जूता
फिर भी नाम रोशन नही कर पाया जूता    

इन्सान की कामयाबी मे साथ रहा जूता   
होली  पर गल  का  हार बनता रहा जूता 
जब से नेताओं  के  सिर पड़ने लगा जूता 
तभी से अपनी पहचान बना पाया जूता। 





























कवि तुम लिखो

भूख  से  दम  तोड़ रहे   भुखे                                                                                                                        
गरीब  बच्चों के बारे में लिखो
                           दहेज़ के लालच में जलाई
                    जा रही दुल्हन के बारे में लिखो

देश की सीमा पर शहीद जवान के
बिलखते परिवार के बारे में लिखो
                    देश में हर रोज हो रहे घोटालों
                  और भ्रस्टाचार के बारे में लिखो

  झुग्गियों और फुटपाथों पर
सड़ रही जिंदगियों पर लिखो
                      औरतों पर हो रहे जुल्म और
                           बलात्कार के ऊपर लिखो

        बेटे के इन्तजार में आँखे
   बिछाए बाप के बारे में लिखो
                       किसी तलाकशुदा नारी की
                      काली रातों के बारे में लिखो

    माँ की बुझी हुयी आशाओं
टूटे हुए दिल के बारे में लिखो
                      बिना इलाज के मरते किसी
                    गरीब के दर्द के बारे में लिखो

    कवि  कुछ ऐसा लिखो कि
मानव की मानवता जाग उठे
                   चौराहे पर खड़ा मूक दर्शक भी
                   अन्याय का प्रतिकार कर उठे।























गाँव का कुआँ






गाँव के कुए में
जब तक पानी रहा

पुरे गाँव के घरों में
मूणं, मटका, घड़ा भरा रहा

पनिहारिने सज-धज कर
पानी लाने जाती रही

पायली झंकार से गाँव की
गलियाँ जंवा होती रही

लेकिन जब से नल आया
गाँव की रौनक चली गयी

पनघट के पीछे गाँव की
गलियाँ भी सुनी हो गयी

अब तो पानी भी नलो में
बूंद- बूंद कर के आता है

गाँव वालों के दिलो में
अगन सी लगाता है

मचा हुआ है गाँवो में
पानी के लिए हाहाकार

न जाने कब आएगी गाँवों मे
फिर से पानी की बहार।

समन्दर के किनारे

समन्दर के किनारे
देखा लहरें आ रही थी 
किनारे से टकरा कर जा रही थी
जीवन में दुःख-सुख भी तो
इसी तरह से आते-जाते हैं

समन्दर के किनारे
पड़ी रेत को मुट्ठी में उठाया
देखा कण-कण निकलता जा रहा है
जीवन भी तो इसी तरह क्षण-क्षण
बीतता जा रहा है

समन्दर के किनारे
पड़ी सीपियों को देखा जो
अपना अनमोल मोती खो चुकी थी
मानव जीवन भी तो अनमोल है जिसे
हम व्येर्थ में जा रहे हैं

किनारे से टकराती
पीछे से लहर की आवाज आई
मै जीवन की बाजी जीत गयी
समंदर बोला- अब लौट जा
तुम्हारी अवधि बीत गयी। 





































जब हम गंगा में

पुस्तकें

पुस्तको की भी एक
अलग दुनिया होती है
एक अलग पहचान होती है

जैसे कुछ पुस्तकें ड्राइंग रूम
की शोभा होती है जो हमेशा
ड्राइंग रूम में ही सजी रहती है

कुछ पुस्तकें सजी-संवरी होती ह
जिन्हें देख कर एक बार हाथ में
उठाने का मन करता है

कुछ पुस्तकें नीरस होती है
जो केवल सूचनाओं से भरी रहती है
जरुरत के समय हम उन्हें पढ़ते हैं

कुछ पुस्तकें दुःख-दर्द की गाथाओं से
भरी रहती है जिन्हें पढ़ कर हम
दुःख के सागर में डूब जाते है

कुछ पुस्तकें कब आई और कब
गई  पता भी नहीं चलता
केवल नाम मिलता है

कुछ पुस्तकें शिक्षाप्रद होती है
जिन्हें पढ़ कर ज्ञान मिलता है
जीवन को एक नयी राह मिलती है

कुछ पुस्तकें भाग्यशाली होती हैं
जिन्हें विनम्रता के साथ खोला
और आदर के साथ पढ़ा जाता है

कुछ पुस्तकें बड़ी बदनसीब होती है
जो केवल रटने के काम आती है
गुलाब के मुरझाये फुल इन्ही में मिलते है

कुछ पुस्तकों के मधुर शब्द
हमारे होठों पर बैठ जाते है और
हम उन्हें आनंद से गुनगुनाते है

कुछ पुस्तकें अँधेरे के गर्त में पड़ी रहती है
जिन्हें कभी कोई अन्वेषक ही
ढूंढ़ कर बाहर निकालता है

कुछ पुस्तकें महान लेखको के द्वारा
लिखी होती है जिन्हें उत्सुकता और
सम्मान के साथ पढ़ा जाता है

कुछ पुस्तकें कालजयी होती है
जो बार-बार संवर्धित,संशोधित होकर
नए संस्करण में छप कर आती  है।



























जीने का मजा आ गया

तुम्हारे साथ अब कुछ भी नामुमकिन सा नहीं लगता 
अब तो आसमान के तारों को गिनने का भी मन बन गया है। 

आज कल न जाने क्यों सब कुछ ख़ास सा लगता है 
चीजे तो वही है लेकिन जीने का मजा आ गया है। 

कभी चाहत थी हर ख़ुशी मेरी हो 
लेकिन तुम्हारा साथ पा कर बाँटना आ गया है। 

अब शब्दों  का इस्तेमाल क्यों करे हम 
जब आँखों से सब कुछ कहना आ गया है।  

प्यार तो सभी करते है लेकिन 
हमें कर के निभाना आ गया है।  

तुम्हारा मुस्कराना और मेरी झुकती आँखों का सलाम 
पचास वर्ष साथ जीने का मजा आ गया है। 

हीर-राँझा की जगह अब हमारे प्यार की चर्चाऐ हैं 
तुम्हारी सांसो की महक से हवाओं का रुख भी बदल गया है। 

(हमारी शादी के पचास वर्ष २० मई २०१४ को पुरे हो रहे हैं, इसी ख़ुशी में वेलेनटाइन डे पर शब्दो के कुछ फूल मैंने उसकी झोली में रखे। )